ख़तरे में कौन? धर्म या समाज!

सही_दिशा

वाह रे समाज,
हमे तुम पर गर्व हो रहा है. तुमने इतनी तरक़्क़ी कर ली की अब तुम्हारे हर बंदे के पास एक खास तरह के चश्मा है.

आज हम जहाँ है वो कुछ भी नहीं है, पर बड़ी बात, बड़ी चीज की सुरुआत है. आज हम चाहे जिस धर्म में हो उसी धर्म पर खतरा है. हर कोई अपने धर्म को लेके परेशान है की उकसे धर्म का अस्तित्व कैसे बचाया जाए. बात इतनी बढ़ गई है की हर कोई तलवार ले के अपने घर से निकल गया है. हर कोई अपने बच्चों को एक तलवार दे दिया है और साथ ही ये बोला भी है की अगर मुझे कुछ हो जाए तो अपने धर्म के लिए ऐसे ही अपनी जान की बाजी लगा देना.

इस खतरे को देखते हुए हर धर्म ने अपने छमता के अनुरूप सेना तैयार किया है और अगर कोई कमी रह गयी है तो उसे पूरा करने को कोशिश की जा रही है. आखिर कोई इस दौड़ में पीछे ना रह जाए. अगर ऐसा हुआ तो उसका धर्म खत्म हो जाएगा. इस लिए यह और जरूरी हो जाता है की जितना हो गैर धर्म वालो को मारा जाए, उनके खून बहाये जाए, और यह सही भी तो है क्योंकि ऐसा हम धर्म रक्षा के लिए कर रहे है. और आप तो जानते ही है की हर धर्म में लिखा है की धर्म का रक्षा के लिए जान देना या लेना दोनो सौभाग्य की बात है.

कहने का मतलब साफ है की अगर आप ने अभी तक ऐसा सुरु नही किया है तो अभी कर दीजिए. हथियार उठा लीजिए. अपने अंदर क्रोध को जन्म दीजिए. और आप के नजदीक जितने भी गैर धर्मी है उसे मार डालिए. अगर आप हिन्दू है तो सारे गैर हिन्दुओ को मार डालो, अगर आप मुसलमान हो सभी गैर मुस्लिम को मार डालो, अगर सिक्ख हो तो गैर सिक्खों को मारो आदि.

इंसान तो जन्म लेता है मरता है पर धर्म को आँच नहीं आनी चाहिए. चाहे इसके लिए कितनी ही बड़ी कीमत क्यो ना चुकानी पड़े. चाहे इस धरती को निर्जन ही क्यों ना करनी पड़े. पर धर्म पर कोई आँच नहीं आनी चाहिए.

हमें पता है, सुरुआत में आप को थोड़ा कस्ट होगा, पर आप को कस्ट सहना होगा, धर्म को बचना होगा. अपने आँखों पर हमेशा धर्म का चस्मा पहने रहना होगा. हर घटना और दुर्घटना को धर्म के चश्मे से देखना होगा.

मौत पर आप को दुखी नहीं होना है आप को मरने वाले से अपना रिश्ता देखना होगा. मारने वाले का गुनाह नहीं उसका धर्म देखना होगा. अगर अपराधी आप के धर्म का है तो उसका साथ देना होगा. और मरने वाला आप के धर्म का नहीं है तो मातम नहीं खुशी मनाना होगा. क्योकि इंसानो से आप का क्या वास्ता नहीं, आप को अपने धर्म की फिकर करनी है.

आप के सामने अगर किसी बच्ची की इजात लूटी जा रही है तो आप को उसे नहीं बचना है बल्कि ये पता करना है की बच्ची का धर्म क्या है, अगर वह आप के धर्म की नहीं है तो आप को चुपचाप वहाँ से नहीं जाना है आप को पता करना है की जो उसके साथ दुष्कर्म कर रहा है वो किस धर्म का है, अगर वो भी आप के धर्म का नहीं है तो आप वहां से चुपचाप निकल सकते हैं. लेकिन अगर दुष्कर्मी आप के धर्म का है तो आप को उसकी मदद करनी चाहिए, आप को भी उस दुष्कर्मियों का साथ देना चाहिए, आखिर धर्म का सवाल है. आप किसी को अपने बेटी अपनी बहन कैसे मान सकते है, अगर वह आप के धर्म से नहीं है.

दर्द

अगर ऊपर की बातो को पढ़ कर आप को मेरे ऊपर गुस्सा आ रहा है तो जरा सोचिए क्या आप के अंदर ऐसी आदतें नहीं है? क्या आप हर किसी या किसी भी बात में गैर जरूरी धर्म को बीच में नहीं ले आते है? क्या आप ऐसा करने वाले लोगो का साथ नही दे रहे है? क्या आप धर्म को देख कर अपने फैसले नहीं बदल रहे है? क्या आप इस बात से इत्तफाक रखते है की धर्म पर खतरा नहीं इंसानो पर खतरा है? क्या आप ने कभी ऐसीे बातो का बिरोध किया जो हमारे बीच धार्मिक भेद-भाव को बढ़वा दे रही है? क्या आप ने अपने बच्चों को बताया की धर्म के आर में किसी का खून बहाना हर हाल में गुनाह है, अपराध है और इसके लिए आप को ईश्वर कभी माफ नहीं करता है. अगर ऐसा नहीं है तो आप भी उन लोगो में सामिल है जिनकी में आलोचना करता हूँ.

लेख: बम्भू कुमार, भाषा सहयोग: सुनीता शर्मा

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